-मेरी दृष्टि में कृष्णा से राधा श्रेष्ठ हैं। कृष्ण गीता का उपदेश ढोये फिरते है। राधा ने ‘रामायण’ या ‘गीता’ के सहारे नहीं अपनाया कृष्ण को । राधा आदर्श की कायल नहीं हैं। इसलिए तो जीवन के यथार्थ में उन्होंने कृष्ण को एकाकार कर लिया। तर्क के द्वारा उनको मोहित करना उनका लक्ष्य नहीं रहा वही होकर उन्होंने कृष्ण को आत्मसात कर लिया। कृष्ण ऋषि-महर्षि की दृष्टि में महापुरुष हों, कर्मयोगी हों श्रंगारी-सहजमन, किंतु राधा में अकात्मता का भाव मात्र है। वह वहीं हो गयी हैं, उनके कृष्ण गुणों से अपने को आच्छादित नहीं किया । यों कहें कि कृष्ण राधा नहीं हो सकें, राधा कृष्ण हो गयीं । वह उनके अतिरिक्त किसी को नहीं जानतीं। तर्कशास्त्र, पुराण आदि में चर्चा चाहे जितनी बार की जाय, कृष्ण राधा से श्रेष्ठ नही सिद्ध किये जा सकते । सच तो यह है कि कृष्ण ने तर्कों का आश्रय लिया पर राधा ने किसी का नहीं। वह तो कृष्णमय हो गयीं तो, उसमें तर्क की गुंजाइश कहाँ ! राधा कृष्ण में खाली प्रेम नहीं है जैसे सीता–राम में । राधा को लौकिकता को भी संभावना पड़ा । आरंभ से ही अलग-थलग रहीं, उन्होंने कृष्ण से कुछ नहीं चाहा । यह भी नहीं कि वह उन्हीं के पास रहें। सच्ची बात तो यह है कि उन्हीं (कृष्ण) में तन्मय होने के कारण उनको अलग से जानने की जरूरत ही नहीं समझीं। स्वयं वही हो गयीं। राजनीति ने कृष्ण को भिन्न-भिन्न रूपों में बांटा, पर एकमात्र प्रणय ने राधा को कृष्णमय बना दिया।Tuesday, 13 September 2011
एकमात्र प्रणय ने राधा को कृष्णमय बना दिया।
-मेरी दृष्टि में कृष्णा से राधा श्रेष्ठ हैं। कृष्ण गीता का उपदेश ढोये फिरते है। राधा ने ‘रामायण’ या ‘गीता’ के सहारे नहीं अपनाया कृष्ण को । राधा आदर्श की कायल नहीं हैं। इसलिए तो जीवन के यथार्थ में उन्होंने कृष्ण को एकाकार कर लिया। तर्क के द्वारा उनको मोहित करना उनका लक्ष्य नहीं रहा वही होकर उन्होंने कृष्ण को आत्मसात कर लिया। कृष्ण ऋषि-महर्षि की दृष्टि में महापुरुष हों, कर्मयोगी हों श्रंगारी-सहजमन, किंतु राधा में अकात्मता का भाव मात्र है। वह वहीं हो गयी हैं, उनके कृष्ण गुणों से अपने को आच्छादित नहीं किया । यों कहें कि कृष्ण राधा नहीं हो सकें, राधा कृष्ण हो गयीं । वह उनके अतिरिक्त किसी को नहीं जानतीं। तर्कशास्त्र, पुराण आदि में चर्चा चाहे जितनी बार की जाय, कृष्ण राधा से श्रेष्ठ नही सिद्ध किये जा सकते । सच तो यह है कि कृष्ण ने तर्कों का आश्रय लिया पर राधा ने किसी का नहीं। वह तो कृष्णमय हो गयीं तो, उसमें तर्क की गुंजाइश कहाँ ! राधा कृष्ण में खाली प्रेम नहीं है जैसे सीता–राम में । राधा को लौकिकता को भी संभावना पड़ा । आरंभ से ही अलग-थलग रहीं, उन्होंने कृष्ण से कुछ नहीं चाहा । यह भी नहीं कि वह उन्हीं के पास रहें। सच्ची बात तो यह है कि उन्हीं (कृष्ण) में तन्मय होने के कारण उनको अलग से जानने की जरूरत ही नहीं समझीं। स्वयं वही हो गयीं। राजनीति ने कृष्ण को भिन्न-भिन्न रूपों में बांटा, पर एकमात्र प्रणय ने राधा को कृष्णमय बना दिया।ब्रह्मा ने कराई राधा-कृष्ण की शादी
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.MEIN TO SAWARIYA KE RANG RAACHI !!!!!!!!!!!!!!!!!
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भांडीर वन। माना जाता है कि राधा और कृष्ण की शादी कराने में ब्रह्मा जी का बड़ा योगदान था।
भगवान ब्रह्मा ने जब श्रीकृष्ण को सारी बातें याद दिलाईं तो उन्हें सबकुछ याद आ गया। इसके बाद ब्रह्मा जी ने अपने हाथों से शादी के लिए वेदी को सजाया।
गर्ग संहिता के मुताबिक शादी से पहले उन्होंने श्रीकृष्ण और राधा से सात मंत्र पढ़वाए। भांडीर वन के वेदीनुमा वही पेड़ के नीचे जहां पर बैठकर राधा और कृष्ण ने शादी हुई थी।
दोनों की शादी कराने के बाद भगवान ब्रह्मा अपने लोक को लौट गए। लेकिन इस वन में राधा और कृष्ण अपने प्रेम में डूब गए।
दरअसल गर्ग संहिता के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण ही इस जगत के आधार हैं। माना जाता है कि जिस तरह से शिव की शक्ति पार्वती हैं। उसी तरह से भगवान कृष्ण की शक्ति राधा हैं।

राधा-कृष्ण विवाह
हम में से बहुत से लोग यही जानते हैं कि राधाजी श्रीकृष्ण की प्रेयसी थीं परन्तु इनका विवाह नहीं हुआ था। श्रीकृष्ण के गुरू गर्गाचार्य जी द्वारा रचित "गर्ग संहिता" में यह वर्णन है कि राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था। एक बार नन्द बाबा कृष्ण जी को गोद में लिए हुए गाएं चरा रहे थे। गाएं चराते-चराते वे वन में काफी आगे निकल आए। अचानक बादल गरजने लगे और आंधी चलने लगी। नन्द बाबा ने देखा कि सुन्दर वस्त्र आभूषणों से सजी राधा जी प्रकट हुई। नन्द बाबा ने राधा जी को प्रणाम किया और कहा कि वे जानते हैं कि उनकी गोद मे साक्षात श्रीहरि हैं और उन्हें गर्ग जी ने यह रहस्य बता दिया था। भगवान कृष्ण को राधाजी को सौंप कर नन्द बाबा चले गए। तब भगवान कृष्ण युवा रूप में आ गए। वहां एक विवाह मण्डप बना और विवाह की सारी सामग्री सुसज्जित रूप में वहां थी। भगवान कृष्ण राधाजी के साथ उस मण्डप में सुंदर सिंहासन पर विराजमान हुए। तभी वहां ब्रम्हा जी प्रकट हुए और भगवान कृष्ण का गुणगान करने के बाद कहा कि वे ही उन दोनों का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न कराएंगे। ब्रम्हा जी ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ विवाह कराया और दक्षिणा में भगवान से उनके चरणों की भंक्ति मांगी। विवाह संपन्न कराने के बाद ब्रम्हा जी लौट गए। नवविवाहित युगल ने हंसते खेलते कुछ समय यमुना के तट पर बिताया। अचानक भगवान कृष्ण फिर से शिशु रूप में आ गए। राधाजी का मन तो नहीं भरा था पर वे जानती थीं कि श्री हरि भगवान की लीलाएं अद्भुत हैं। वे शिशु रूपधारी श्री कृष्ण को लेकर माता यशोदा के पास गई और कहा कि रास्ते में नन्द बाबा ने उन्हें बालक कृष्ण को उन्हें देने को कहा था। राधा जी उम्र में श्रीकृष्ण से बडी थीं। यदि राधा-कृष्ण की मिलन स्थली की भौगोलिक पृष्ठभूमि देखें तो नन्द गांव से बरसाना 7 किमी है तथा वह वन जहाँ ये गायें चराने जाते थे नंद गांव और बरसाना के ठीक मघ्य में है। भारतीय वाङग्मय के अघ्ययन से प्रकट होता है कि राधा प्रेम का प्रतीक थीं और कृष्ण और राधा के बीच दैहिक संबंधों की कोई भी अवधारणा शास्त्रों में नहीं है। इसलिए इस प्रेम कोAristocratic Love की श्रेणी में रखते हैं। इसलिए कृष्ण के साथ सदा राधाजी को ही प्रतिष्ठा मिली।
जादू कैसा तूने लाली पे किया रे..
राधा को सुध नाही
कान्हा के आलिन्गन मे
दोनो का मन रमा
एक दूजे के मॅन मे..
कान्हा भूले गय्या अपनी
भूले गोकुल नगरी..
राधिका भी भूली सखिया,
पनघट पे गगरी..
रास की रामाई मे रम्वत जा रे
ओ कान्हा राधिका का तू हौ जा रे...
चंदा की चटक चुनर
कैसी लहराई.. कान्हा की बाहो मे
कैसी लाली शरमाई..
उठाके चले राधा रानी को कान्हा
कनुप्रिया जो थकने को आई
मेघ झूमे धरा पर बूँदे गिराए रे
झूमे धरती सारी अंबर झूमे जाए रे
सारा जग राधा कान्हा, ..मय होई जाए रे..
कान्हा राधा.. राधा कान्हा मय होई जाए रे..

ओ मोरी राधा रानी.
ओ मोरी राधा रानी.. काहे
जा बैठी तू जमुना किनारे
मोरी भोली गयया .. बंसी
तोहे ही पुकारे..
गोपियन तो सितारो जैसी
चंदा तू है राधा..
मैं तो अधूरा हू तू
अंग मोरा आधा ..
तू ही मोरी जीवन साथी
जेसे दिया और बाती
काहे भूलू तोहे, मोहे तू बता रे
ओ मोरी राधा रानी.. अरज करू आ रे..
.......राधा जी भी बड़ी भोली है जल्दी से मान जाती है......
ओ कन्हाई मोरे.. सुनता जा रे
तेरे संग प्रीत कभी टूट ना पाए रे.
तुझ पर आने से पहले
विपदा... आँगन मोरे आए रे...
तोरि सुनकर मुरलिया
मैं नाची जाउ..
देख देख जमुना मे ख़ुदको
शरमाती जाउ..
जादू कैसा तूने लाली पे किया रे..
ओ कन्हाई मोरे.. बतलाता जा रे..
.........और समस्त पृथ्वी प्रेम के पाशो मे बँध जाती है क्योंकि कान्हा राधा के रास का प्रारंभ होता है.. ...
जा बैठी तू जमुना किनारे
मोरी भोली गयया .. बंसी
तोहे ही पुकारे..
गोपियन तो सितारो जैसी
चंदा तू है राधा..
मैं तो अधूरा हू तू
अंग मोरा आधा ..
तू ही मोरी जीवन साथी
जेसे दिया और बाती
काहे भूलू तोहे, मोहे तू बता रे
ओ मोरी राधा रानी.. अरज करू आ रे..
.......राधा जी भी बड़ी भोली है जल्दी से मान जाती है......
ओ कन्हाई मोरे.. सुनता जा रे
तेरे संग प्रीत कभी टूट ना पाए रे.
तुझ पर आने से पहले
विपदा... आँगन मोरे आए रे...
तोरि सुनकर मुरलिया
मैं नाची जाउ..
देख देख जमुना मे ख़ुदको
शरमाती जाउ..
जादू कैसा तूने लाली पे किया रे..
ओ कन्हाई मोरे.. बतलाता जा रे..
.........और समस्त पृथ्वी प्रेम के पाशो मे बँध जाती है क्योंकि कान्हा राधा के रास का प्रारंभ होता है.. ...

♥ ♥ ♥ am in love with shri krishna ......♥ ♥ ♥
"♫•*¨*•.¸¸♥ JAI SHRI KRISHNA JI ♥ ¸¸.•*¨*•♫"
"♫•*¨*•.¸¸♥ JAI SHRI KRISHNA JI ♥ ¸¸.•*¨*•♫"beholding your blessed face
gloom does a quick retrace
I am filled with joy and peace
Energy is in full flow, at ease
You have cloaked self by night
Flooding devotees with daylight
Every pore has goose bumps
Your vision gives throat lumps
I am overcome with love’s glow
In life’s journey of ebb and flow
My soul leaps in somersaults
Your beauty doth my soul exalt
You are master, I am your slave
Love for you has made me brave
You have always been by my side
In shortsightedness I have decried
You are within, without, below, above
Ever showering on all blissful love
gloom does a quick retrace
I am filled with joy and peace
Energy is in full flow, at ease
You have cloaked self by night
Flooding devotees with daylight
Every pore has goose bumps
Your vision gives throat lumps
I am overcome with love’s glow
In life’s journey of ebb and flow
My soul leaps in somersaults
Your beauty doth my soul exalt
You are master, I am your slave
Love for you has made me brave
You have always been by my side
In shortsightedness I have decried
You are within, without, below, above
Ever showering on all blissful love
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